शीर्षक: रोहिंग्या घुसपैठ: भारत के लिए एक सुरक्षा और नीतिगत संकट
परिचय
हाल के वर्षों में रोहिंग्या घुसपैठ का मुद्दा भारत के लिए आंतरिक सुरक्षा और नीतिगत प्रतिक्रिया के लिहाज़ से एक गंभीर चिंता बन गया है। जहां अंतर्राष्ट्रीय समुदाय रोहिंग्या को जातीय उत्पीड़न के शिकार के रूप में देखता है, वहीं भारत को इस संकट का मूल्यांकन राष्ट्रीय हित के दृष्टिकोण से करना चाहिए। भारत में इनकी अवैध घुसपैठ जनसांख्यिकीय संतुलन, सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने और आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन गई है।
म्यांमार में रोहिंग्या की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय है जो पीढ़ियों से म्यांमार के रखाइन (पूर्व में अराकान) राज्य में रह रहा है। हालांकि, उनका स्थानीयता का दावा विवादित रहा है। ब्रिटिश शासन और उसके बाद की अवधि में इनके कुछ समूहों द्वारा स्थानीय बौद्धों के खिलाफ हिंसक घटनाएं—लूट, बलात्कार और हत्याएं—की गईं, जिसके चलते स्थानीय लोगों में इनके खिलाफ घृणा गहराती गई।
इतिहास में कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार जब रोहिंग्या बहुसंख्यक होते हैं, तो शरीयत कानून थोपने की कोशिश करते हैं। लेकिन जब अल्पसंख्यक होते हैं, तो "पीड़ित कार्ड" खेलकर अंतर्राष्ट्रीय सहानुभूति पाने की रणनीति अपनाते हैं।
म्यांमार की नागरिकता नीति और निष्कासन
1982 के नागरिकता कानून ने रोहिंग्या को मान्यता प्राप्त जातीय समूहों की सूची से बाहर कर दिया, जिससे वे विधिवत रूप से "राज्यविहीन" हो गए। इसके बाद कई सैन्य ऑपरेशन हुए, जैसे कि 1978 में ऑपरेशन किंग ड्रैगन और 2016-17 में सैन्य कार्रवाई, जिसमें बड़े पैमाने पर रोहिंग्या मारे गए और लगभग 7 लाख से अधिक बांग्लादेश भाग गए।
बांग्लादेश में अस्थायी शरण और भारत की चिंता
बांग्लादेश ने शुरू में मानवता के आधार पर शरण दी, लेकिन अब वो रोहिंग्याओं को स्थायी रूप से नहीं रखना चाहता। उधर भारत में असम, पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्व के रास्तों से घुसपैठ तेज़ हुई है। आज दिल्ली, जम्मू, हैदराबाद जैसे शहरों में ये अवैध रूप से बसे हुए हैं, और आधार, वोटर आईडी जैसे नकली दस्तावेज़ों का प्रयोग करते हैं।
सुरक्षा खतरे, आपराधिक पृष्ठभूमि और उग्रवादी संबंध
भारतीय खुफिया एजेंसियों ने चेताया है कि कुछ रोहिंग्या कट्टर इस्लामी संगठनों जैसे लश्कर-ए-तैयबा और हूजी से संपर्क में हैं। एआरएसए (ARSA) जैसे आतंकी संगठन रोहिंग्या समुदाय में सक्रिय हैं। इनके खिलाफ हथियारों की तस्करी, मानव तस्करी और अपराधों की रिपोर्टें आई हैं।
कई रोहिंग्या आपराधिक गतिविधियों—जैसे ड्रग तस्करी, चोरी, और सांप्रदायिक हिंसा—में लिप्त पाए गए हैं। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय लोगों से टकराव और पुलिस पर हमले भी हुए हैं।
भारत के लिए समस्याएं
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राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा: इनकी गतिविधियाँ आतंकी संगठनों से जुड़ी हो सकती हैं, जिससे देश की आंतरिक सुरक्षा पर खतरा बढ़ता है।
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सामाजिक-सांस्कृतिक असंतुलन: अवैध बस्तियाँ, नौकरियों पर कब्जा, संसाधनों पर दबाव—यह सब भारत के गरीब नागरिकों पर असर डालता है।
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अपराध और कानून व्यवस्था: ड्रग तस्करी, झगड़े, चोरी, और झूठे दस्तावेजों के माध्यम से पहचान हासिल करना—यह सब पुलिस व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है।
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जनसांख्यिकीय असंतुलन: सीमावर्ती क्षेत्रों में इनकी बस्तियाँ स्थानीय संस्कृति और राजनीति को प्रभावित कर रही हैं।
पश्चिम बंगाल सरकार की भूमिका
पश्चिम बंगाल अवैध रोहिंग्या घुसपैठ का मुख्य मार्ग बन चुका है। लेकिन राज्य सरकार ने बार-बार रोहिंग्या घुसपैठ को नज़रअंदाज़ किया है और कभी-कभी समर्थन भी दिया है। विश्लेषकों के अनुसार यह वोट बैंक की राजनीति है।
राज्य सरकार ने कई बार इनके पहचान पत्र जैसे राशन कार्ड और वोटर आईडी उपलब्ध कराए हैं, जिससे केंद्र सरकार की नीतियाँ निष्प्रभावी हो जाती हैं। इससे पश्चिम बंगाल "सुरक्षित ज़ोन" बन गया है जहाँ और रोहिंग्या आना चाहते हैं।
मानवाधिकार बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा
भारत मानवाधिकारों का सम्मान करता है, लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। हम अपने नागरिकों की सुरक्षा को किसी भी अंतर्राष्ट्रीय दबाव या भावनात्मक अपील के आगे बलि नहीं चढ़ा सकते। देश को भीतर से खोखला नहीं किया जा सकता।
"मानवाधिकारों की चिंता अपनी जगह, लेकिन अगर राष्ट्र रहेगा ही नहीं, तो अधिकार किसके रहेंगे?"
समाधान और सुझाव
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सीमाओं की सख्त निगरानी हो, बायोमेट्रिक डेटा लिया जाए।
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अवैध बस्तियों को हटाया जाए।
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इनकी वापसी के लिए म्यांमार और बांग्लादेश से कूटनीतिक बातचीत हो।
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राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट नीति बने, जो अवैध घुसपैठियों को रोके।
निष्कर्ष
रोहिंग्या संकट सिर्फ म्यांमार की समस्या नहीं है; अब यह भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और सामाजिक सद्भाव का सवाल है। भारत को अपने हितों को प्राथमिकता देनी होगी। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मुद्दा देश को भीतर से खोखला कर सकता है।


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